Sunday, 3 November 2013

तम की विदाई


धरा रोशनी में हो जैसे नहाई
दिवाली की रौनक हरेक ओर छाई

उमंगों की किरणें झलकने लगी हैं
नयी ज्योति आशा की जलने लगी हैं
रंगोली से हमने ये चौखट सजाई  

पिरोई है हमने उम्मीदों की लड़ियाँ
ग़मों से ही छनकर निकलती हैं खुशियाँ
हमें मिलके करनी है तम की विदाई

है महलों में जगमग, अँधेरी है बस्ती
कहीं मौज-मस्ती, कहीं जान सस्ती
अमीरी गरीबी की गहरी है खाई


न बाकी बचे अब कहीं भी अँधेरा
न उजड़े कहीं भी किसी का बसेरा
कहीं कोई आंसू न दे अब दिखाई

नहीं मिट सकी है जिनकी उदासी
चलो उनमें बांटे हंसी हम जरा सी
मिले अब अमावस से सबको रिहाई

खड़ा आँधियों में अकेला ये दीपक
अंधेरों से लड़ना सिखाता है दीपक
मुश्किलों से डरना नहीं मेरे भाई

बुझी है जो बाती उन्हें फिर जलाएँ
मिटे आह पीड़ा, जलें हर बलाएँ  
तहे दिल से देते हैं सबको बधाई 

हिमकर श्याम
(चित्र गूगल से साभार)

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