Wednesday, 16 August 2017

हुक़ूमत को किसी से क्या पड़ी है





उलझ  कर  गर्दिशों  में  रह गई है
भला  यह ज़िन्दगी भी ज़िन्दगी है

कोई मरता है  मर जाये  उन्हें क्या
हुक़ूमत को  किसी  से क्या पड़ी है

हुआ आज़ाद  कहने को वतन यह
मगर  क़ायम अभी  तक बेबसी है

फ़क़त  धोका  निगाहों का उजाला
चिराग़ों   के   तले   ही   तीरग़ी   है

ये किसने दी हवा फिर रंजिशों  को
फ़ज़ा में किस क़दर नफ़रत घुली है

कोई हिन्दू, कोई  मुस्लिम यहाँ  पर
   मिलता   ढूंढ़ने  से  आदमी  है

कई  कमज़ोरियाँ  लेकर  चली  थी
यहाँ   ज़म्हूरियत   औंधे   पड़ी  है

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)


Sunday, 14 May 2017

माँ के क़दमों में है ज़न्नत दोस्तो




वह ख़ुदा की ख़ास नेमत दोस्तो
माँ के क़दमों में है ज़न्नत दोस्तो

लाख परदा तुम गिरा लो झूठ पर
छुप नहीं सकती हक़ीक़त दोस्तो

है तरक्क़ी मुल्क़ में हमने सुना
कम कहाँ होती मशक्क़त दोस्तो

ज़िन्दगी किसकी मुकम्मल है यहाँ
साथ सबके इक मुसीबत दोस्तो

इन परिंदों को भला क्या चाहिए 
आबो दाने की जरूरत दोस्तो

मुश्किलों में साथ देता कौन है
पर सभी देते नसीहत दोस्तो

रात भर करवट बदलते हम रहे
अब सही जाती न फ़ुर्क़त दोस्तो

इश्क़ की पाकीज़गी जाने कहाँ
प्यार में भी है कुदूरत दोस्तो

ग़म हमेशा साथ हिमकर के रहा
ज़िंदगानी में अज़ीयत दोस्तो


मुकम्मल : सम्पूर्ण, फ़ुर्क़त : जुदाई, कुदूरत : मैल, अज़ीयत : कष्ट 



© हिमकर श्याम